ग्रामीण, आदिवासी और वन अंचलों के नजदीक रहने वाले लोग हमेशा से ही
अनेक तरह की वन संपदाओं से जुड़े रहे हैं। इसलिए आदिवासियों का आहार पूरी
तरह प्रकृति आधारित होता है और मौसम व जलवायु के अनुरूप बदलता भी रहता हैं।
वैज्ञानिक इस बात से भी सहमत है कि इनके आहार पोषक तत्वों की भरमार लिए
हुए हैं। आइए हम भी जाने ऐसे कुछ आहारों को जो हम सभी के बेहतर सेहत के लिए
रामबाण साबित हो सकते हैं।
1. कुंदरू के फल में कैरोटीन प्रचुरता से पाया जाता है जो
विटामिन ए का दूत कहलाता है। कुंदरू में कैरोटीन के अलावा प्रोटीन, फाइबर
और कैल्शियम जैसे महत्वपूर्ण तत्व भी पाए जाते है। गुजरात के डांगी
आदिवासियों के बीच कुंदरू की सब्जी बड़ी प्रचलित है। इन आदिवासियों के
अनुसार इस फल की अधकच्ची सब्जी लगातार कुछ दिनों तक खाने से आंखों से चश्मा
तक उतर जाता है। साथ ही, माना जाता है कि इसकी सब्जी के निरंतर उपयोग से
बाल झड़ने का क्रम बंद हो जाता है, गंजेपन से भी बचा जा सकता है।
2. आंखों की बेहतर रोशनी के लिए मुनगे की फलियों को
बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। कुछ आदिवासी इसकी पत्तियों को बेसन के साथ
मिलाकर पकौड़े भी बनाते है। इन आदिवासियों के अनुसार पेट में कृमि (वर्म)
होने की स्थिति में यदि मुनगे की चटनी व पकौड़े खिलाए जाएं तो कृमि शौच से
बाहर निकल आते हैं।
3. पातालकोट और डांग दोनों ही आदिवासी क्षेत्रों में
टमाटर आहार का सबसे मुख्य अंग है। रोजाना खाने के साथ किसी न किसी रूप से
टमाटर का उपयोग निश्चित ही होता हैं। टमाटर फाइबर, कार्बोहाइड्रेट्स,
पोटैशियम और लौह तत्वों से भरपूर होते हैं। इसमें वसा और सोडियम की मात्रा
भी कम होती है। टमाटर में लाइकोपीन नामक एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है जो
त्वचा को लंबी उम्र तक जवान बनाए रखता है।
4. डांग गुजरात में आदिवासी घुईयां या अरबी के
पत्तों (200 ग्राम) को उबालते हैं, थोड़ी काली मिर्च डालकर इस उबले रस का
सेवन दिन में दो बार करते हैं। पत्तियों को कम तेल में हल्का पकाकर सब्जी
के तौर पर भी सेवन किया जाता है, माना जाता है कि हाइपरटेंशन या हाई ब्लड
प्रेेशर के लिए ये एक बेहतर उपाय है।
5. कुल्थी और चौलाई जैसी भाजियां खून के लाल कणों की
संख्या बढ़ाने के साथ ब्लड प्लेटलेट्स (बिम्बाणु) को भी बढ़ाते है यानि
आपकी ताकत बढ़ाने और आपको स्वस्थ रखने की ताकत इन भाजियों में समाहित है।
इन भाजियों को कम नमक और तेल के साथ कुछ समय के लिए हल्का सा गर्म किया जाए
और तरकारी के तौर पर खाया जाए तो बेहद फायदेमंद साबित होती हैं।
6. डांग में आदिवासी कोमल बांस की सब्जी बनाते हैं
जो कि स्फूर्तिदायक, खून साफ करने व घाव के साथ ही मूत्र संबंधित रोगों के
लिए उत्तम आहार है।
7. पातालकोट में महुआ के फूलों को सुखाकर पाउडर/ आटा तैयार किया जाता है। इससे चपाती बनाई जाती है। वैसे आधुनिक शोधों के परिणामों को देखा जाए तो महुए के सूखे फूल मूत्र संबंधित रोगो के निवारण के लिए फायदेमंद है और ये टॉनिक की तरह भी काम करते हैं।
8. मध्यप्रदेश के पातालकोट के आदिवासी मुनगा/ सहजन
की पत्तियों की चटनी तैयार कर भोजन के साथ बड़े आनंद से खाते हैं। साथ ही,
मुनगे की फलियां भी दाल और सब्जी में डालते हैं। मुनगे की पत्तियों और
फलियों में विटामिन ए की प्रचुरता आधुनिक विज्ञान अच्छी तरह से साबित कर
चुका है।


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