Thursday, 31 March 2016

पाएं ‘डार्क सर्कल’ से छुटकारा

कोई भी एक घरेलू नुस्खा  और पाएं ‘डार्क सर्कल’ से छुटकारा
कहीं आप यह तो नहीं सोच रहे कि डार्क सर्कल की परेशानी केवल महिलाओं को होती है? या फिर पुरुषों को होती भी है तो कोई फर्क नहीं पड़ता? ऐसा बिल्कुल भी नहीं है… क्योंकि आंखों के नीच होने वाले गहरे रंग के यह धब्बे ना केवल महिलाओं को, बल्कि पुरुषों को भी उदास कर देते हैं। इनकी वजह से सुंदर से सुंदर चेहरा भी ढला हुआ लगता है।
कारण
डार्क सर्कल होने के कई कारण हो सकते हैं, अनियमित आहार, समय से ना सोना या फिर पूरी नींद ना लेना, घंटों लैपटॉप पर काम करना, रात के अंधेरे में भी स्मार्टफोन या गैजेट्स का उपयोग करना। किंतु कारण कुछ भी हो, आज हम आपको डार्क सर्कल से हमेशा के लिए निजात पाने के घरेलू नुस्खे बताने वाले हैं।डार्क सर्कल कम करने के तरीके-
तो यदि आप भी डार्क सर्कल कम करने के लिए महंगी क्रीम्स का इस्तेमाल करते हैं, ब्यूटी पार्लर जाकर समय के साथ-साथ पैसा भी खर्च करते हैं, तो अब यह सब करना भूल जाएं। क्योंकि विशेषज्ञों के अनुसार घरेलू नुस्खे ही डार्क सर्कल को पूरी तरह से हल्के करने में सहायक होते हैं, फिर आप चाहे कितनी ही महंगी क्रीम क्यों ना ले आएं।
संतरे का रस
चेहरे की रंगत को बढ़ाने के लिए विटामिन-सी की आवश्यकता होती है, और विटामिन सी संतरे में अधिक मात्रा में होता है। डार्क सर्कल कम करने के लिए संतरे के रस का इस्तेमाल करें।
उपाय
संतरे के रस में ग्लिसरीन की कुछ बूंदें मिलाएं और इस पेस्ट को हर रोज आंखों और आसपास के एरिया पर लगाएं। यह डार्क सर्कल से निजात दिलाने का प्रभावशाली तरीका है।
शहद और बादाम तेल
बादाम तेल का घरेलू नुस्खा तो हम पहले ही बता चुके, लेकिन इस तेल में शहद मिलाने से यह और भी अच्छे-से काम करता है। इसके लिए बादाम के तेल में थोड़ा-सा शहद मिलाकर रात को सोने से पहले आंखों के नीचे लगा लें और सुबह उठकर साधारण पानी से चेहरा धो लें। ऐसा रोज़ रात करें, कुछ ही दिनों में डार्क सर्कल कम हो जाएंगे।
आलू
क्या आप जानते हैं कि धूप की किरणों से होने वाली टैनिंग काम करने के लिए आलू एक परफेक्ट इलाज है? यदि नहीं तो कभी इस्तेमाल करके देखिएगा…. आलू को त्वचा पर होने वाले दाग-धब्बे काटने वाली औषधि माना जाता है, तो फिर डार्क सर्कल कम करने के लिए इसे इस्तेमाल क्यों ना करें।
उपाय
आलू से डार्क सर्कल कम करने का उपाय कुछ इस प्रकार है – रात में सोने से पहले चेहरे को अच्छे से साफ करें। इसके बाद आलू की पतली स्लाइस काटकर उन्हें आंखों पर 20 से 25 मिनट रखें। इसके बाद चेहरा को अच्छे से साफ कर लें।
चाय का पानी
नहीं आपको इसे पीना नहीं है, डार्क सर्कल कम करने के लिए कुछ इस प्रकार चाय के पानी का प्रयोग करें – सबसे पहले चायपत्ती को पानी के साथ उबाल लें और फिर ठंडा होने के लिए रख दें। इसके बाद रुई के फाहे को उसमें भिगोकर आंखों के नीचे और आस-पास लगाएं। थोड़ी देर बाद पानी से चेहरा साफ कर लें। नियमित रूप से ऐसा करने से चेहरे के काले घेरे तेजी से कम हो जाएंगे।
टमाटर
डार्क सर्कल कम करने का पहला इलाज आपके किचन में ही है। लाल रसीले टमाटर खाने में जितने स्वादिष्ट लगते हैं, उससे कई अधिक सुंदरता पाने में सहायक होते हैं। यह बात तो अधिकतर लोग जानते ही हैं कि टमाटर हमारे चेहरे की रंगत को बढ़ाने के लिए कितना सही है, यह एक परफेक्ट फेस पैक माना जाता है।
टमाटर का उपयोग
अब डार्क सर्कल कम करने के लिए टमाटर के उपयोग की बात आती है, तो हम आपको यहां एक छोटा सा उपाय बताने जा रहे हैं। इसके लिए आप टमाटर के रस में नींबू का रस और चुटकीभर बेसन और हल्दी मिला लें। इस पेस्टर को अपनी आंखों के चारों ओर लगाएं और 20 मिनट के बाद चेहरे को धो लें।
हफ्ते में 3 बार करें इस्तेमाल
इस पेस्ट को हफ्ते में 3 बार आंखों के नीचे लगाने से आपको फर्क दिखाई देगा। डार्क सर्कल धीरे-धीरे कम होने लगेगा। लेकिन ध्यान रहे कि इस पेस्ट को आंखों के बॉल से दूर रखें, हल्दी आंखों में जलन पैदा कर सकती है।
गुलाब जल
मेरे हिसाब से दस में से 7 महिलाएं फेस पैक लगाते समय उसमें गुलाब जल जरूर मिलाती हैं, ताकि त्वचा पर अधिक निखार आए। गुलाब जल में मौजूद तत्व त्वचा के गहरेपन को काटकर सुंदर निखार लाते हैं।
उपाय
तो यदि आप इसकी मदद से डार्क सर्कल कम करना चाहते हैं तो दिन में जब भी आपको दस मिनट का समय मिले, तो बंद आंखों पर गुलाब जल में भिगोई हुई रूई को रखें। ऐसा करने से आंखों के आसपास की त्वचा चमक उठेगी।
टी बैग
चाय का पानी बनाने के बाद जो टी बैग बच गए हैं, उन्हें भी आप इस्तेमाल कर सकते हैं। उपयोग होने के बाद टी बैग को ठंडा होने दें और फिर इनसे आंखों के नीच हल्का-हल्का मसाज करें। दरअसल टी-बैग्स में मौजूद तत्व टैनिन आंखों के आसपास की सूजन और काली त्वचा को पहले जैसे करता है और आपको डार्क सर्कल से निजात मिलता है।
बादाम का तेल
बादाम गुणों की खान है, बालों को लंबा करने की बात हो या दिमाग तेज़ करने के लिए… हर रूप में औषधीय गुणों से प्रधान है बादाम। लेकिन एक और गुण जिससे आप अनजान हैं वह है बादाम के उपयोग से डार्क सर्कल कम करना, जानिए क्या है उपाय….
उपाय
इसके लिए आपको अधिक मेहनत करने की जरूरत नहीं है। आपको केवल शुद्ध बादाम का तेल चाहिए, इस तेल को आंखों के आस-पास लगाकर कुछ मिनटों के लिए छोड़ दें। फिर उंगलियों से 10 मिनट तक हल्की मालिश करें। इसके बाद चेहरा साफ कर लें।

भूख नही लगती? तो अपनाइये यह आयुर्वेदिक नुस्खे!

भूख नही लगती? तो अपनाइये यह आयुर्वेदिक नुस्खे!
1.भूख नही लगने पर आधा माशा फ़ूला हुआ सुहागा एक कप गुनगुने पानी में दो तीन बार लेने से भूख खुल जाती है।
2.काला नमक चाटने से गैस खारिज होती है,और भूख बढती है,यह नमक पेट को भी साफ़ करता है।
3.हरड का चूर्ण सौंठ और गुड के साथ अथवा सेंधे नमक के साह सेवन करने से मंदाग्नि ठीक होती है।
4.सेंधा नमक,हींग अजवायन और त्रिफ़ला का समभाग लेकर कूट पीस कर चूर्ण बना लें,इस चूर्ण के बराबर पुराना गुड लेकर सारे चूर्ण के अन्दर मिला दें,और छोटी छोटी गोलियां बना लें,रोजाना ताजे पानी से एक या दो गोली लेना चालू कर दे,यह गोलियां खाना खाने के बाद ली जाती है,इससे खाना पचेगा भी और भूख भी बढेगी।
5.हरड को नीब की निबोलियों के साथ लेने से भूख बढती है,और शरीर के चर्म रोगों का भी नाश होता है।
6.हरड गुड और सौंठ का चूर्ण बनाकर उसे थोडा थोडा मट्ठे के साथ रोजाना लेने से भूख खुल जाती है।
7.छाछ के रोजाना लेने से मंदाग्नि खत्म हो जाती है।
8.सोंठ का चूर्ण घी में मिलाकर चाटने से और गरम जल खूब पीने से भूख खूब लगती है।
9.रोज भोजन करने से पहले छिली हुई अदरक को सेंधा नमक लगाकर खाने से भूख बढती है।
10.लाल मिर्च को नीबू के रस में चालीस दिन तक खरल करके दो दो रत्ती की गोलियां बना लें,रोज एक गोली खाने से भूख बढती है।
11.गेंहूं के चोकर में सेंधा नमक और अजवायन मिलाकर रोटी बनवायी जाये,इससे भूख बहुत बढती है।
12.चने के प्रयोग से पाचन शक्ति बढती है,इसके लिये उबले चने चने की रोटी भुने चने खाने चाहिये।
13.मोठ की दाल मंदाग्नि और बुखार की नाशक है।
14.डेढ ग्राम सांभर नमक रोज सुबह फ़ांककर पानी पीलें,मंदाग्नि का नामोनिशान मिट जायेगा।
15.टमाटर का सास चाटते रहने से या पके टमाटर की फ़ांके चूंसते रहने से भूख खुल जाती है।
16.दो छुहारों का गूदा निकाल कर तीन सौ ग्राम दूध में पका लें,छुहारों का सत निकलने पर दूध को पी लें,इससे खाना भी पचता है,और भूख भी लगती है।
17.जीरा सोंठ अजवायन छोटी पीपल और काली मिर्च समभाग में लें,उसमे थोडी सी हींग मिला लें,फ़िर इन सबको खूब बारीक पीस कर चूर्ण बना लें,इस चूर्ण का एक चम्मच भाग छाछ मे मिलाकर रोजाना पीना चालू करें,दो सप्ताह तक लेने से कैसी भी कब्जियत में फ़ायदा देगा।
19.भोजन के आधा घंटा पूर्व चुकन्दर गाजर टमाटर पत्ता गोभी पालक तथा अन्य हरी साग सब्जियां व फ़लीदार सब्जियों के मिश्रण का रस पीने से भूख बढती है।
20.सेब का सेवन करने से भूख भी बढती है और खून भी साफ़ होता है।
21.अजवायन चालीस ग्राम सेंधा नमक दस ग्राम दोनो को कूट पीस कर एक साफ़ बोतल में रखलें,इसमे दो ग्राम चूर्ण रोजाना सवेरे फ़ांक कर ऊपर से पानी पी लें,इससे भूख भी बढेगी और वात वाली बीमारियां भी समाप्त होंगी।
22.एक पाव सौंफ़ पानी में भिगो दें,फ़िर इस पानी में चौगुनी मिश्री मिलाकर पका लें,इस शरबत को चाटने से भूख बढती है।
23.पकी हुई मीठी इमली के पत्ते सेंधा नमक या काला नमक काली मिर्च और हींग का काढा बनाकर पीने से मंदाग्नि ठीक हो जाती है।
24.जायफ़ल का एक ग्राम चूर्ण शहद के साथ चाटने से जठराग्नि प्रबल होकर मंदाग्नि दूर होती है।
25.सोंफ़ सोंठ और मिश्री सभी को समान भाग लेकर ताजे पानी से रोजाना लेना चाहिये इससे पाचन शक्ति प्रबल होती है।
26.जवाखार और सोंठ का चूर्ण गरम पानी से लेने से मंदाग्नि दूर होती है।
27.लीची को भोजन से पहले लेने से पाचन शक्ति और भूख में बढोत्तरी होती है।
28.अनार भी क्षुधा वर्धक होता है,इसका सेवन करने से भूख बढती है।

एरंण्ड के लाभ

एरंण्ड के लाभ
एरंड का पौधा प्राय: सारे भारत में पाया जाता है। एरंड की खेती भी की जाती है और इसे खेतों के किनारे-किनारे लगाया जाता है। ऊंचाई में यह 2.4 से 4.5 मीटर होता है। एरंड का तना हरा और चिकना तथा छोटी-छोटी शाखाओं से युक्त होता है। एरंड के पत्ते हरे, खंडित, अंगुलियों के समान 5 से 11 खंडों में विभाजित होते हैं। इसके फूल लाल व बैंगनी रंग के 30 से 60 सेमी. लंबे पुष्पदंड पर लगते हैं। फल बैंगनी और लाल मिश्रित रंग के गुच्छे के रूप में लगते हैं। प्रत्येक फल में 3 बीज होते हैं, जो कड़े आवरण से ढके होते हैं। एरंड के पौधे के तने, पत्तों और टहनियों के ऊपर धूल जैसा आवरण रहता है, जो हाथ लगाने पर चिपक जाता है। ये दो प्रकार का होते हैं लाल रंग के तने और पत्ते वाले एरंड को लाल और सफेद रंग के होने पर सफेद एरंड कहते हैं।
विभिन्न भाषाओं में नाम :
संस्कृत एरंड, गन्धर्वहस्त, वर्धमान, व्याघ्रपुच्छ, उत्तानपत्रक
हिंदी. अंडी, अरण्ड, एरंड
मराठी एरंडी
गुजराती एरंडो दिवेलेगों
बंगाली भेरेंडा, शादारेंडी
मलयालम अमन वक्कु
फारसी . वेद अंजीर
अरबी खिर्वअ
अंग्रेजी कैस्टर प्लांट
लैटिन रिसिनस कोम्युनिट्स
स्वाद : एरंड खाने में तीखा, बेस्वाद होता है।
स्वरूप : एरंड दो प्रकार का होता है पहला सफेद और दूसरा लाल। इसकी दो जातियां और भी होती हैं। एक मल एरंड और दूसरी वर्षा एरंड। वर्षा एरंड, बरसात के सीजन में उगता है। मल एरंड 15 वर्ष तक रह सकता है। वर्षा एरंड के बीज छोटे होते हैं, परन्तु उनमें मल एरंड से अधिक तेल निकलता है। एरंड का तेल पेट साफ करने वाला होता है, परन्तु अधिक तीव्र न होने के कारण बालकों को देने से कोई हानि नहीं होती है।
पेड़ : एरंड का पेड़ 2.4 से 4.5 मीटर, पतला, लम्बा और चिकना होता है।
फूल : इसका फूल एक लिंगी, लाल बैंगनी रंग के होते हैं।
फल : एरंड के फल के ऊपर हरे रंग का आवरण होता है। प्रत्येक फल में तीन बीज होते हैं।
बीज : इसके बीज सफेद चिकने होते हैं।
स्वभाव : एरंड गर्म प्रकृति का होता है।
हानिकारक : एरंड आमाशय को शिथिल करता है, गर्मी उत्पन्न करता है और उल्टी लाता है। इसके सेवन से जी घबराने लगता है। लाल एरंड के 20 बीजों की गिरी नशा पैदा करती है और ज्यादा खाने से बहुत उल्टी होता है एवं घबराहट या बेहोशी तक भी हो सकती है। यह आमाशय के लिए अहितकर होता है।
तुलना : इसकी तुलना जमालघोटा से की जा सकती है।
दोषों को दूर करने वाला : कतीरा और मस्तगी एरंड के गुणों को सुरक्षित रखकर इसके दोषों को दूर करता है।
नोट : लाल एरंड का तेल 5 से 10 ग्राम की मात्रा में गर्म दूध के साथ लेने से योनिदर्द, वायुगोला, वातरक्त, हृदय रोग, जीर्णज्वर (पुराना बुखार), कमर के दर्द, पीठ और कब्ज के दर्द को मिटाता है। यह दिमाग, रुचि, आरोग्यता, स्मृति (याददास्त), बल और आयु को बढ़ाता है और हृदय को बलवान करता है।
गुण : एरंड पुराने मल को निकालकर पेट को हल्का करती है। यह ठंडी प्रकृति वालों के लिए अच्छा है, अर्द्धांग वात, गृध्रसी झानक बाई (साइटिका के कारण उत्पन्न बाय का दर्द), जलोदर (पेट में पानी की अधिकता) तथा समस्त वायुरोगों की नाशक है इसके पत्ते, जड़, बीज और तेल सभी औषधि के रूप में इस्तेमाल किए जाते है। यहां तक कि ज्योतिषी और तांत्रिक भी ग्रहों के दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए एरंड का प्रयोग करते हैं।
सफेद एरंड : सफेद एरंड, बुखार, कफ, पेट दर्द, सूजन, बदन दर्द, कमर दर्द, सिर दर्द, मोटापा, प्रमेह और अंडवृद्धि का नाश करता है।
लाल एरंड : पेट के कीड़े, बवासीर, रक्तदोष (रक्तविकार), भूख कम लगना, और पीलिया रोग का नाश करता है। इसके अन्य गुण सफेद एरंड के जैसे हैं।
एरंड के पत्ते : एरंड के पत्ते वात पित्त को बढ़ाते हैं और मूत्रकृच्छ्र (पेशाब करने में कठिनाई होना), वायु, कफ और कीड़ों का नाश करते हैं।
एरंड के अंकुर : एरंड के अंकुर फोड़े, पेट के दर्द, खांसी, पेट के कीड़े आदि रोगों का नाश करते हैं।
एरंड के फूल : एरंड के फूल ठंड से उत्पन्न रोग जैसे खांसी, जुकाम और बलगम तथा पेट दर्द संबधी बीमारी का नाश करता है।
एरंड के बीजों का गूदा : एरंड के बीजों का गूदा बदन दर्द, पेट दर्द, फोड़े-फुंसी, भूख कम लगना तथा यकृत सम्बंधी बीमारी का नाश करता है।
एरंड का तेल : पेट की बीमारी, फोड़े-फुन्सी, सर्दी से होने वाले रोग, सूजन, कमर, पीठ, पेट और गुदा के दर्द का नाश करता है।
हानिकारक प्रभाव : राइसिन नामक विषैला तत्त्व होने के कारण एरंड के 40-50 दाने खाने से या 10 ग्राम बीजों के छिलकों का चूर्ण खाने से उल्टी होकर व्यक्ति की मौत भी हो सकती है।
मात्रा : बीज 2 से 6 दाने। तेल 5 से 15 मिलीलीटर। पत्तों का चूर्ण 3 से 4 ग्राम। जड़ की पिसी लुगदी 10 से 20 ग्राम । जड़ का चूर्ण 1 से 3 ग्राम।
विभिन्न रोगों में उपयोगी :
1. चर्म (त्वचा) के रोग :
• एरंण्ड की जड़ 20 ग्राम को 400 मिलीलीटर पानी में पकायें। जब यह 100 मिलीलीटर शेष बचे तो इसे पिलाने से चर्म रोगों में लाभ होता है।
• एरंड के तेल की मालिश करते रहने से शरीर के किसी भी अंग की त्वचा फटने का कष्ट दूर होता है।
2. सिर पर बाल उगाने के लिए : ऐसे शिशु जिनके सिर पर बाल नहीं उगते हो या बहुत कम हो या ऐसे पुरुष-स्त्री जिनकी पलकों व भौंहों पर बहुत कम बाल हों तो उन्हें एरंड के तेल की मालिश नियमित रूप से सोते समय करना चाहिए। इससे कुछ ही हफ्तों में सुंदर, घने, लंबे, काले बाल पैदा हो जाएंगे।
3. सिर दर्द : एरंड के तेल की मालिश सिर में करने से सिर दर्द की पीड़ा दूर होती है। एरंड की जड़ को पानी में पीसकर माथे पर लगाने से भी सिर दर्द में राहत मिलती है।
4. जलने पर : एरंड का तेल थोड़े-से चूने में फेंटकर आग से जले घावों पर लगाने से वे शीघ्र भर जाते हैं। एरंड के पत्तों के रस में बराबर की मात्रा में सरसों का तेल फेंटकर लगाने से भी यही लाभ मिलता है।
5. पायरिया : एरंड के तेल में कपूर का चूर्ण मिलाकर दिन में 2 बार नियमित रूप से मसूढ़ों की मालिश करते रहने से पायरिया रोग में आराम मिलता है।
6. शिश्न (लिंग) की शक्ति बढ़ाने के लिए : मीठे तेल में एरंड के पीसे बीजों का चूर्ण औटाकर शिश्न (लिंग) पर नियमित रूप से मालिश करते रहने से उसकी शक्ति बढ़ती है।
7. मोटापा दूर करना :
• एरंड की जड़ का काढ़ा छानकर एक-एक चम्मच की मात्रा में शहद के साथ दिन में तीन बार सेवन करें।
• एरंड के पत्ते, लाल चंदन, सहजन के पत्ते, निर्गुण्डी को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें, बाद में 2 कलियां लहसुन की डालकर पकाकर काढ़ा बनाकर रखा रहने दें इसमें से जो भाप निकले उसकी उस भाप से गला सेंकने और काढ़े से कुल्ला करना चाहिए।
• एरंड के पत्तों का खार (क्षार) को हींग डालकर पीये और ऊपर से भात (चावल) खायें। इससे लाभ हो जाता है।
• अरण्ड के पत्तों की सब्जी बनाकर खाने से मोटापा दूर हो जाता है।
8. स्तनों में दूध वृद्धि हेतु :
• एरंड के पत्तों का रस दो चम्मच की मात्रा में दिन में तीन बार कुछ दिनों तक नियमित पिलाएं। इससे स्तनों में दूध की वृद्धि होती है।
• अरण्ड (एरंड) पाक को 10 से लेकर 20 ग्राम की मात्रा में गुनगुने दूध के साथ प्रतिदिन सुबह और शाम को पिलाने से प्रसूता यानी बच्चे को जन्म देने वाली माता के स्तनों में दूध में वृद्धि होती है।
• मां के स्तनों पर एरंड के तेल की मालिश दिन में 2-3 बार करने से स्तनों में पर्याप्त मात्रा में दूध की वृद्धि होती है।
9. बालकों के पेट के कृमि (कीड़े) :
• एरंड का तेल गर्म पानी के साथ देना चाहिए अथवा एरंड का रस शहद में मिलाकर बच्चों को पिलाना चाहिए। इससे बच्चों के पेट के कीडे़ नष्ट हो जाते हैं।
• एरंड के पत्तों का रस नित्य 2-3 बार बच्चे की गुदा में लगाने से बच्चों के चुनने (पेट के कीड़े) मर जाते हैं।
10. बिच्छू के विष पर : एरंड के पत्तों का रस, शरीर के जिस भाग की ओर दंश न हुआ हो, उस ओर के कान में डालें और बहुत देर तक कान को ज्यों का त्यों रहने दें। इस प्रकार दो-तीन बार डालने से बिच्छू का विष उतर जाता है।
11. नींद कम आना : एरंड के अंकुर बारीक पीसकर उसमें थोड़ा सा दूध मिलाकर लेप बना लें। इस लेप को कपाल (सिर) तथा कान के पास लेप करने से नींद का कम आना दूर हो जाता है।
12. पीनस रोग- एरण्ड के तेल को तपाकर रख लें और जिस ओर नाक में पीनस हो गया हो उस ओर के नथुने से एरण्ड के तेल को दिन में कई बार सूंघने से पीनस नष्ट हो जाती है।
• एरंड की जड़ और सोंठ को घिसकर योनि पर लेप करें। इससे योनि दर्द ठीक हो जाता है।
• एरंड तेल में रूई का फोहा भिगोकर योनि में धारण करने से योनि का दर्द मिट जाता है।
13. पीठ के दर्द में : एरंड के तेल को गाय के पेशाब में मिलाकर देना चाहिए। इससे पीठ, कमर, कन्धे, पेट और पैरों का शूल (दर्द) नष्ट हो जाता है।

Wednesday, 30 March 2016

सेंधा नमक एक बेहतरीन ब्यूटी प्रोडक्ट

सेंधा नमक को एप्सम सॉल्ट के नाम से भी जाना जाता है. एप्सम सॉल्ट के इस्तेमाल से डेड स्क‍िन तो साफ हो ही जाती है साथ ही ब्लैकहेड्स भी दूर हो जाते हैं. एप्सम सॉल्ट को इन चीजों के साथ मिलाकर चेहरे की सफाई करना वाकई फायदेमंद साबित होगा.  सेंधा नमक एक बेहतरीन ब्यूटी प्रोडक्ट है. आप चाहें तो इसका इस्तेमाल स्क्रब के रूप में करके त्वचा से जुड़ी कई समस्याओं को दूर कर सकते हैं. ये पूरी तरह नेचुरल है और इससे त्वचा को कोई नुकसान भी नहीं होता है. सेंधा नमक के स्क्रब के इस्‍तेमाल से डेड स्क‍िन निकल जाती है. पर सीधे तौर पर नमक का इस्तेमाल करने से बेहतर है कि आप इसे किसी चीज के साथ मिलाकर लगाएं.
1. सॉल्‍ट एंड लेमन स्‍क्रब
एप्सम सॉल्ट में कुछ बूंदें नींबू की मिलाकर एक मिश्रण तैयार कर लें. इसे चेहरे पर गोलाई में घुमाकर लगाएं. सप्ताह में दो बार इस स्क्रब का इस्तेमाल करने से मुंहासे, डेड स्क‍िन, ब्‍लैकहेड्स और व्हाइटहेड्स आसानी से साफ हो जाते हैं. 

2. सॉल्‍ट एंड आलमंड ऑयल
अगर आपकी स्क‍िन ड्राई है तो सॉल्ट एंड ऑयल का ये मिश्रण आपके लिए काफी फायदेमंद रहेगा. आप चाहें तो एप्सम सॉल्ट में बादाम के तेल की या फिर जैतून के तेल की कुछ बूंदे मिला सकते हैं. इससे चेहरा तो साफ हो ही जाएगा, साथ ही चेहरे की नमी भी बरकरार रहेगी.
3. सॉल्ट एंड शहद
गर्मियों के लिहाज से ये बेहतरीन स्क्रब है. शहद टैनिंग दूर करने का काम करता है और साथ ही त्वचा के नेचुरल मॉइश्चर को लॉक भी करता है. इस स्क्रब को सप्ताह में दो बार लगाकर आप खूबसूरत, बेदाग त्वचा पा सकते हैं.
4. सॉल्ट एंड ओटमील
सॉल्ट और ओटमील का स्क्रब ऑयली स्क‍िन वालों के लिए बेहतरीन है. ओटमील और एप्सम सॉल्ट को अच्छी तरह मिला लें और इसमें नींबू का रस, बादाम का तेल मिक्स कर लें. इस मिश्रण को गोलाई में चेहरे पर हल्के हाथों से लगाएं. उसके बाद गुनगुने पानी से चेहरा धो लें.

अनार के इस्तेमाल से आप निखरी, बेदाग त्वचा पा सकते हैं?

अनार के छोटे-छोटे दानों में सेहत का खजाना छिपा होता है पर क्या आपको ये पता है कि अनार के इस्तेमाल से आप निखरी, बेदाग त्वचा पा सकते हैं? अनार विटामिन, लवण और एंटी-ऑक्सीडेंट्स से भरपूर फल है, जो सेहत के साथ-साथ त्वचा के लिए भी बहुत फायदेमंद है.
इसके नियमित इस्तेमाल से आप खूबसूरत, निखरी और बेदाग त्वचा पा सकते हैं. इसके साथ ही ये कमाल का एंटी-एजिंग एजेंट भी है, जो बढ़ती उम्र के लक्षणों को हावी नहीं होने देता है. ये न केवल त्वचा की रंगत को निखारने का काम करता है बल्क‍ि त्वचा से जुड़ी कई समस्याओं से छुटकारा दिलाने में भी उपयोगी है. ये त्वचा को भीतर से पोषित करने में भी मददगार है.
आप चाहें तो निखरी, बेदाग त्वचा के लिए अनार के इन मास्क को अपना सकते हैं:
1. अनार और शहद का मास्क
अनार की बीजों को पीसकर उनका एक पेस्ट तैयार कर लें. इस पेस्ट में एक चम्मच शहद मिला लें. इस पेस्ट को पूरे चेहरे और गले पर अच्छी तरह लगा लें. कुछ देर इसे सूखने के लिए छोड़ दें. जब ये सूखने लगे तो हल्के गुनगुने पानी से चेहरा साफ कर लें. चेहरे की चमक आपको साफ नजर आएगी. 

2. अनार और दही का मास्क
निखरी और बेदाग त्वचा पाने का ये सबसे अच्छा उपाय है. अनार के कुछ बीजों को पीसकर उसमें दही मिला लें. इस पेस्ट को चेहरे पर लगाकर कुछ देर के लिए छोड़ दें. कुछ देर बार चेहरे को साफ पानी से धो लें. फर्क आपको साफ नजर आएगा.
3. अनार और नींबू का पैक
नींबू में विटामिन सी भरपूर मात्रा में पाया जाता है. वहीं अनार, एंटी-ऑक्सीडेंट के गुणों से युक्त होता है. इन दोनों का मिश्रण त्वचा पर निखार लाने का काम करता है. अनार के बीजों को पीसकर उसका एक पेस्ट बना लें और उसमें नींबू का रस मिलाकर चेहरे पर लगाएं. कुछ देर बाद चेहरे को साफ पानी से धो लें.
4. अनार और ग्रीन टी का मास्क
त्वचा पर निखार के लिए आप चाहें तो अनार और ग्रीन टी का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. ग्रीन टी और अनार के बीजों से तैयार मास्क आपके लिए बहुत फायदेमंद रहेगा.
5. अनार और ओटमील का पेस्ट
अनार और ओटमील का मिश्रण भी निखार लाने का एक बेहतरीन उपाय है. इससे त्वचा पर निखार तो आता है ही साथ ही डेड स्किन हट जाने से ये सॉफ्ट भी बनती है.

Sunday, 27 March 2016

दूध के साथ गुड़ का सेवन करने के स्वास्थ्य लाभ

गुड़, स्वाद के साथ ही सेहत का भी खजाना है. इसका सेवन करने से न सिर्फ मुंह का स्वाद नहीं बदलना ब्लकि इससे कई बीमारियों से मुक्ति भी पाई जा सकती है. दूध के साथ अक्सर ही आपने घर के बड़े लोगों को गुड़ का सेवन करते देखा होगा. कई लोगों को दूध के साथ गुड़ खाना पसंद नहीं होता लेकिन क्या आप इसके फायदे जानते हैं?
दूध के साथ गुड़ का सेवन करने के स्वास्थ्य लाभ जानने के बाद आप भी इसे खाने से परहेज नहीं कर पाएंगे. आइए जानते हैं इसके सेहतमंद फायदों के बारे में...
- गुड़ का सेवन करने से हमारा खून शुद्ध होता है और दूध हमारे शरीर में ऊर्जा बनाएं रखता है. इसलिए हमें हर रोज सोने से पहले दूध में गुड़ डालकर पीना चाहिए.
- इसे खाने से हमारी पाचन क्रिया से जुड़ी सारी समस्याएं दूर हो जाती है. साथ ही इसका सेवन करने से पेट में गैस नहीं बनती.
- अगर आपके जोड़ों में दर्द रहता है तो हर रोज गुड़ की छोटा सा पीस अदरक के साथ मिलाकर खाएं और गरम दूध पीएं. ऐसा करने से आपके जोड़ मजबूत होंगे और दर्द भी दूर हो जाएगा.
- गुड़ का सेवन करने से बाल अच्छे होते हैं और त्वचा मुलायम बनती है. अगर आपके चेहरे पर मुंहासे और एक्ने हैं तो इसे खाने से वह भी ठीक हो जाएंगे.
- महिलाओं को पीरियड्स के दर्द से बचने के लिए गरम दूध में गुड़ डालकर कर जरूर पीना चाहिए.
- डॉक्टर हमेशा गर्भवती महिलाओं को थकावट और कमजोरी को दूर करने से लिए गुड़ का सेवन करने के सलाह देते हैं. अगर गर्भवती महिला हर रोज गुड़ खाती है तो उन्हें एनीमिया नहीं होता.
- मांसपेशियों की मजबूती के लिए आप हर रोज एक ग्लास दूध में गुड़ डाल कर पीएं.
- अगर आप को अस्थमा की दिक्कत है तो घर में गुड़ और काले तिल के लड्डू बना कर खाएं और इसके बाद एक ग्लास गरम दूध का सेवन करें.
- अगर आप मोटापे के शिकार हैं तो इसे बचने के लिए गुड़ को शक्कर की जगह दूध या चाय में डाल कर पीएं.

देशी गाय गोमूत्र महत्वपूर्ण औषधि के रूप में



 गोमूत्र का प्राचीन चिकित्सा विज्ञान में ही महत्वपूर्ण स्थान नहीं है अपितु वर्तमान अनुसंधानों ने युग का अमृत कहकर गोमूत्र को महत्वपूर्ण औषधि के रूप में स्वीकार किया है। गौमूत्र कड़वा, तीखा और गर्म होता है। यह क्षारयुक्त होने से वातनाशक है। यह लघु अग्निदीपक, मेध्य और पित्तजनक है। वैज्ञानिक विश्लेषण-गोमूत्र में पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नेशियम, क्लोराइड, यूरिया, फास्फेट, अमोनिया, क्रिएटिनिज आदि तत्व होते हैं।

गोमूत्र औषधि
गोमूत्र का आयुर्वेद और अन्य शास्त्रों में चिकित्सकीय महत्व बताया गया है। आयुर्वेद के अनुसार गोमूत्र, लघु अग्निदीपक, मेघाकारक, पित्ताकारक तथा कफ और बात नाशक है और अपच एवं कब्ज को दूर करता है। इसका उपयोग प्राकृतिक चिकित्सा में पंचकर्म क्रियाएं तथा विरेचनार्थ और निरूहवस्ती एवं विभिन्न प्रकार के लेपों में होता है। आयुर्वेद में में संजीवनी बूटी जैसी कई प्रकार की औषधियां गोमूत्र से बनाई जाती हैं। गौमूत्र के प्रमुख योग गोमूत्र क्षार चूर्ण कफ नाशक तथा नेदोहर अर्क मोटापा नाशक हैं।गोमूत्र- श्वांस, कास, शोध, कामला, पण्डु, प्लीहोदर, मल अवरोध, कुष्ठ रोग, चर्म विकार, कृमि, वायु विकार मूत्रावरोध, नेत्र रोग तथा खुजली में लाभदायक है। गुल्य, आनाह, विरेचन कर्म, आस्थापन तथा वस्ति व्याधियों में गोमूत्र का प्रयोग उत्तम रहता है। गोमूत्र अग्नि को प्रदीप्त करता है, क्षुधा [भूख] को बढ़ाता है, अन्न का पाचन करता है एवं मलबद्धता को दूर करता है।गोमूत्र से कुष्ठादि चर्म रोग भी दूर हो सकते हैं तथा कान में डालने से कर्णशूल रोग खत्म होता है और पाण्डु रोग को भी गोमूत्र समाप्त करने की क्षमता रखता है। इसके अलावा आयुर्वेदिक औषधियों का शोधन गोमूत्र में किया जाता है और अनेक प्रकार की औषधियों का सेवन गोमूत्र के साथ करने की सलाह दी जाती है। आयुर्वेद में स्वर्ण, लौह, धतूरा तथा कुचला जैसे द्रव्यों को गोमूत्र से शुद्ध करने का विधान है। गोमूत्र के द्वारा शुद्धीकरण होने पर ये द्रव्य दोषरहित होकर अधिक गुणशाली तथा शरीर के अनुकूल हो जाते हैं। रोगों के निवारण के लिए गोमूत्र का सेवन कई तरह की विधियों से किया जाता है जिनमें पान करना, मालिश करना, पट्टी रखना, एनीमा और गर्म सेंक प्रमुख हैं। गोमूत्र दर्दनिवारक होने के साथ ही गुल्म, पेट के रोग, आनाह, विरेचन कर्म, आस्थापन, वस्ति आदि बीमारियों का नाश करता है। आयुर्वेद में गोमूत्र से कुष्ठï तथा अन्य चर्म रोगों का उपचार किया जाता है। श्वास रोग,आंत्रशोथ, पीलिया भी गोमूत्र से नष्टï होते हैं। मुख रोग, नेत्र रोग, अतिसार, मूत्राघात, कृमिरोग का भी गोमूत्र से उपचार होता है। कान में दर्द होने पर गोमूत्र की दो-चार बूंदें डलने से कान का दर्द नष्टï होता है।आधुनिक चिकित्सा विज्ञानी गोमूत्र को हृदय रोग, कैंसर, टीबी, पीलिया, मिर्गी, हिस्टिरिया जैसे खतरनाक रोगों में प्रभावकारी मानते हैं।

गोमूत्र का कृषि कीटनाशक के रूप में भी अब बहुत उपयोग होने लगा है। गोमूत्र चिकित्सा की प्राचीन विधियों में उसके बाह्य और आंतरिक दोनों प्रकार की बीमारियों के उपयोग की विधियां बताई गई हैं। आधुनिक चिकित्साशास्त्री गोमूत्र की तैयार दवाइयां भी बना रहे हैं

घर में क्यों करते हैं गोबर से लेपन, क्यों छिड़कते हैं गो-मूत्र
आज भी भारत के गांवों में घरों में गोबर से फर्श को लिपने और गो-मूत्र छिड़कने की परंपरा है। गोमूत्र को पवित्र माना जाता है क्योंकि उसमें कीटनाशक के गुण होते हैं। यही कारण है कि पूजा-पाठ से पहले गोबर से लेपन और गोमूत्र का छिड़काव किया जाता है। पूजा-पद्धतियों में पंचगव्य में गोमूत्र को भी शामिल किया गया है। गो-मूत्र में एसिड होता है जो बीमारियों के बैक्टिरियाज को मार देता है। इस कारण घर में गोबर से लिपने और गो-मूत्र छिड़कने की परंपरा थी। प्राचीन गोमूत्र चिकित्सक शास्त्रों में गोमूत्र से चिकित्सा करने वाले ऋषियों आदि का उल्लेख है। उनमें महर्षि पालकाव्य, ऋतुपर्ण, नल और नकुल प्रमुख हैं। इन ऋषियों ने विभिन्न ग्रंथों में गो-मूत्र पर बहुत लिखा है
किस प्रकार बनता है गोमूत्र अर्क आइये जाने-
भट्ठी पर एक बड़ा मटका गोमूत्र से भरकर रख दिया जाता है। भट्ठी के ताप से गर्म होते गोमूत्र को वाष्प के जरिये बाहर निकालने के लिए मटके में एक ओर छोटा सा सुराग निकालकर पाइप के माध्यम से एक बर्तन में छोड़ दिया जाता है। एक-एक बूंद बर्तन में जमा होती रहती है जिसे गौमूत्र अर्क कहा जाता है। सात लीटर गाय के मूत्र में करीब एक लीटर के आसपास अर्क निकलता है।
गोमूत्र से बने अन्य उत्पाद:-
आयुर्वेद के अलावा गोमूत्र नील, हैंड वाश, शैंपू, नेत्र ज्योति, घनवटी, सफेद फिनाइल, कर्णसुधा सहित कई उत्पाद बनाने में प्रयोग किया जाता है।
गाय और गोमूत्र
यदि गाय का मूत्र ही केवल इतना गुणकारी है तो उसके अन्य तत्वों का भी कितना महत्व होगा, यह आसानी से समझा जा सकता है। यही कारण है कि अर्थवेद में कहा गया है-एतद् वै विश्वरूपं सर्वरूपं गोरूपम्।
अर्थात गाय संपूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड का रूप है। इसी कड़ी में एक बंगाली कहावत का भी उल्लेख किया जाना उचित है-जो खाय गोरूर चोना, तार देह होय सोना। अर्थात जो प्रतिदिन गोमूत्र का सेवन करते हैं उनका शरीर सोने जैसा शुद्ध हो जाता है।


  • ·         गोमूत्र कड़वा, तीखा गर्म होता है।
  • ·         गोमूत्र का उपयोग सामान्य और गंभीर बीमारियों के इलाज में किया जाता है।
  • ·         इसीलिए गोमूत्र का पान पवित्र माना गया है।
  • ·         उसमें कीटनाशक के गुण भी होते हैं। इसलिए पूजा-पाठ के पहले उसका छिड़काव करते हैं।
  • ·         गोमूत्र के गुणों के कारण उसे इस युग का अमृत कहा गया है।
  • ·         वैज्ञानिक शोध से गोमूत्र में क्षार तत्वों की अधिकता पाई गई है

लटजीरा का सेवन कितनी बिमारियों के लिए रामबाण है

अपामार्ग यानी कि लटजीरा का सेवन कितनी बिमारियों के लिए रामबाण है और साथ ही ये आपके शरीर के बढे हुए फैट को भी कम करता है। जानिए इसके क्या क्या फायदे हैं ।ये एक सर्वविदित क्षुपजातीय औषधि है जो चिरचिटा नाम से भी जानी जाती है। वर्षा के साथ ही यह अंकुरित होती है, ऋतु के अंत तक बढ़ती है तथा शीत ऋतु में पुष्प फलों से शोभित होती है। ग्रीष्म ऋतु की गर्मी में यह पौधा परिपक्व होकर फलों के साथ ही शुष्क हो जाता है। इसके पुष्प हरी गुलाबी आभा युक्त तथा बीज चावल सदृश होते हैं, जिन्हें ताण्डूल कहते हैं तथा इसे एक वर्ष तक प्रयुक्त किया जा सकता है।लटजीरे के बीजों को एकत्र करके मिटटी के बर्तन में भूनकर उसे पीसकर चूर्ण बनाकर लगभग आधा चम्मच इसे खाया जाये तो भूख कम लगती है तथा यह शरीर की वसा को भी कम करता है। इस प्रकार यह कम करने में भी मदद करता है इसके कोई दुष्परिणाम भी नहीं है। ये आसानी से आयुर्वेद दवा बेचने वाले पंसारी से मिल जाता है। इसका पेड़ सड़क के आसपास देखने को आसानी से मिल जाता है।इसके तने को साफ़ करकर दातुन की तरह उपयोग करें तो दांतों से जो खून बहने की समस्या होती है, वह भी धीरे-धीरे इससे समाप्त हो जाती है।अगर आपको भस्मक रोग है यानि कि जिसमे खूब खाने के बाद भी आपकी भूख नही मिटती और खाने के इच्छा होती ही रहती है, उसके निदान के लिए इसके बीजों को खीर में मिलाकर देने से लाभ मिलता है।बाहरी प्रयोग के रूप में भी इसका चूर्ण मात्र सूँघने से आधा शीशी का दर्द, बेहोशी, मिर्गी में आराम मिलता है।इसके पत्तों का स्वरस दाँतों के दर्द में लाभ करता है तथा पुराने से पुरानी केविटी को भरने में मदद करता है।कुत्ते के काटे स्थान पर तथा सर्पदंश-वृश्चिक दंश अन्य जहरीले कीड़ों के काटे स्थान पर ताजा स्वरस तुरन्त लगा देने से जहर उतर जाता है। यह घरेलू ग्रामीण उपचार के रूप में प्रयुक्त एक सिद्ध प्रयोग है। काटे गए स्थान पर बाद में पत्तों को पीसकर उनकी लुगदी बाँध देते हैं। व्रण दूषित नहीं हो पाता तथा विष के संस्थानिक प्रभाव भी नहीं होते है।
  • बर्र आदि के काटने पर भी अपामार्ग को कूटकर व पीसकर उस लुगदी का लेप करते हैं तो सूजन नहीं आती है।
  • लगभग एक से तीन ग्राम चिरचिटा के पंचांग का क्षार बकरी के दूध के साथ दिन में दो बार लेते हैं। इससे गुर्दे की पथरी गलकर नष्ट हो जाती है।
  • चिरचिटा की 25 ग्राम जड़ों को चावल के पानी में पीसकर बकरी के दूध के साथ दिन में तीन बार लेने से खूनी बवासीर ठीक हो जाती है।
  • चिरचिटा के पंचांग का काढ़ा लगभग 14 से 28 मिलीलीटर दिन में तीन बार सेवन करने से कुष्ठ (कोढ़) रोग ठीक हो जाता है।
  • चिरचिटा की जड़ों को 3 से 6 ग्राम तक की मात्रा में बारीक पीसकर दिन में तीन बार देने से हैजा में लाभ मिलता है।
  • चिरचिटा की लगभग एक से तीन ग्राम पंचांग का क्षार नींबू के रस में या शहद के साथ दिन में तीन बार देने से शारीरिक दर्द में लाभ मिलता है।
  • चिरचिटा को जलाकर, छानकर उसमें उसके बराबर वजन की चीनी मिलाकर एक चुटकी दवा मां के दूध के साथ बच्चे को देने से खांसी बंद हो जाती है।
  • चिरचिटा के कोमल पत्तों को मिश्री के साथ मिलाकर अच्छी तरह पीसकर मक्खन के साथ धीमी आग पर रखे। जब यह गाढ़ा हो जाये तब इसको खाने से ऑवयुक्त दस्त में लाभ मिलता है।
  • 250 ग्राम चिरचिड़ा का रस, 50 ग्राम लहसुन का रस, 50 ग्राम प्याज का रस और 125 ग्राम सरसों का तेल इन सबको मिलाकर आग पर पकायें। पके हुए रस में 6 ग्राम मैनसिल को पीसकर डालें और 20 ग्राम मोम डालकर महीन मलहम बनायें। इस मलहम को मस्सों पर लगाकर पान या धतूरे का पत्ता ऊपर से चिपकाने से बवासीर के मस्से सूखकर ठीक हो जाते हैं।
  • 5 ग्राम से 10 ग्राम चिरचिटा की जड़ का काढ़ा एक से 50 ग्राम सुबह-शाम मुलेठी, गोखरू और पाठा के साथ खाने से गुर्दे की पथरी खत्म हो जाती है। इसकी क्षार अगर भेड़ के पेशाब के साथ खायें तो गुर्दे की पथरी में ज्यादा लाभ होता है।
  • एक ग्राम कालीमिर्च के साथ चिरचिटा की जड़ को दूध में पीसकर नाक में टपकाने से लकवा या पक्षाघात ठीक हो जाता है।
  • चिरचिटा। का चूर्ण लगभग एक ग्राम का चौथाई भाग की मात्रा में लेकर पीने से जलोदर (पेट में पानी भरना) की सूजन कम होकर समाप्त हो जाती है।
  • अपामार्ग (चिरचिटा) के पत्तों के रस में कपूर और चन्दन का तेल मिलाकर शरीर पर मालिश करने से शीतपित्त की खुजली और जलन खत्म होती है।
  • फोड़े की सूजन व दर्द कम करने के लिए चिरचिटा, सज्जीखार अथवा जवाखार का लेप बनाकर फोड़े पर लगाने से फोड़ा फूट जाता है, जिससे दर्द व जलन में रोगी को आराम मिलता है।
  • चिरचिटा की धूनी देने से उपदंश के घाव मिट जाते हैं। 10 ग्राम चिरचिटा की जड़ के रस को सफेद जीरे के 8 ग्राम चूर्ण के साथ मिलाकर पीने से उपदंश में बहुत लाभ होता है। इसके साथ रोगी को मक्खन भी साथ में खिलाना चाहिए।