Sunday, 27 March 2016

देशी गाय गोमूत्र महत्वपूर्ण औषधि के रूप में



 गोमूत्र का प्राचीन चिकित्सा विज्ञान में ही महत्वपूर्ण स्थान नहीं है अपितु वर्तमान अनुसंधानों ने युग का अमृत कहकर गोमूत्र को महत्वपूर्ण औषधि के रूप में स्वीकार किया है। गौमूत्र कड़वा, तीखा और गर्म होता है। यह क्षारयुक्त होने से वातनाशक है। यह लघु अग्निदीपक, मेध्य और पित्तजनक है। वैज्ञानिक विश्लेषण-गोमूत्र में पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नेशियम, क्लोराइड, यूरिया, फास्फेट, अमोनिया, क्रिएटिनिज आदि तत्व होते हैं।

गोमूत्र औषधि
गोमूत्र का आयुर्वेद और अन्य शास्त्रों में चिकित्सकीय महत्व बताया गया है। आयुर्वेद के अनुसार गोमूत्र, लघु अग्निदीपक, मेघाकारक, पित्ताकारक तथा कफ और बात नाशक है और अपच एवं कब्ज को दूर करता है। इसका उपयोग प्राकृतिक चिकित्सा में पंचकर्म क्रियाएं तथा विरेचनार्थ और निरूहवस्ती एवं विभिन्न प्रकार के लेपों में होता है। आयुर्वेद में में संजीवनी बूटी जैसी कई प्रकार की औषधियां गोमूत्र से बनाई जाती हैं। गौमूत्र के प्रमुख योग गोमूत्र क्षार चूर्ण कफ नाशक तथा नेदोहर अर्क मोटापा नाशक हैं।गोमूत्र- श्वांस, कास, शोध, कामला, पण्डु, प्लीहोदर, मल अवरोध, कुष्ठ रोग, चर्म विकार, कृमि, वायु विकार मूत्रावरोध, नेत्र रोग तथा खुजली में लाभदायक है। गुल्य, आनाह, विरेचन कर्म, आस्थापन तथा वस्ति व्याधियों में गोमूत्र का प्रयोग उत्तम रहता है। गोमूत्र अग्नि को प्रदीप्त करता है, क्षुधा [भूख] को बढ़ाता है, अन्न का पाचन करता है एवं मलबद्धता को दूर करता है।गोमूत्र से कुष्ठादि चर्म रोग भी दूर हो सकते हैं तथा कान में डालने से कर्णशूल रोग खत्म होता है और पाण्डु रोग को भी गोमूत्र समाप्त करने की क्षमता रखता है। इसके अलावा आयुर्वेदिक औषधियों का शोधन गोमूत्र में किया जाता है और अनेक प्रकार की औषधियों का सेवन गोमूत्र के साथ करने की सलाह दी जाती है। आयुर्वेद में स्वर्ण, लौह, धतूरा तथा कुचला जैसे द्रव्यों को गोमूत्र से शुद्ध करने का विधान है। गोमूत्र के द्वारा शुद्धीकरण होने पर ये द्रव्य दोषरहित होकर अधिक गुणशाली तथा शरीर के अनुकूल हो जाते हैं। रोगों के निवारण के लिए गोमूत्र का सेवन कई तरह की विधियों से किया जाता है जिनमें पान करना, मालिश करना, पट्टी रखना, एनीमा और गर्म सेंक प्रमुख हैं। गोमूत्र दर्दनिवारक होने के साथ ही गुल्म, पेट के रोग, आनाह, विरेचन कर्म, आस्थापन, वस्ति आदि बीमारियों का नाश करता है। आयुर्वेद में गोमूत्र से कुष्ठï तथा अन्य चर्म रोगों का उपचार किया जाता है। श्वास रोग,आंत्रशोथ, पीलिया भी गोमूत्र से नष्टï होते हैं। मुख रोग, नेत्र रोग, अतिसार, मूत्राघात, कृमिरोग का भी गोमूत्र से उपचार होता है। कान में दर्द होने पर गोमूत्र की दो-चार बूंदें डलने से कान का दर्द नष्टï होता है।आधुनिक चिकित्सा विज्ञानी गोमूत्र को हृदय रोग, कैंसर, टीबी, पीलिया, मिर्गी, हिस्टिरिया जैसे खतरनाक रोगों में प्रभावकारी मानते हैं।

गोमूत्र का कृषि कीटनाशक के रूप में भी अब बहुत उपयोग होने लगा है। गोमूत्र चिकित्सा की प्राचीन विधियों में उसके बाह्य और आंतरिक दोनों प्रकार की बीमारियों के उपयोग की विधियां बताई गई हैं। आधुनिक चिकित्साशास्त्री गोमूत्र की तैयार दवाइयां भी बना रहे हैं

घर में क्यों करते हैं गोबर से लेपन, क्यों छिड़कते हैं गो-मूत्र
आज भी भारत के गांवों में घरों में गोबर से फर्श को लिपने और गो-मूत्र छिड़कने की परंपरा है। गोमूत्र को पवित्र माना जाता है क्योंकि उसमें कीटनाशक के गुण होते हैं। यही कारण है कि पूजा-पाठ से पहले गोबर से लेपन और गोमूत्र का छिड़काव किया जाता है। पूजा-पद्धतियों में पंचगव्य में गोमूत्र को भी शामिल किया गया है। गो-मूत्र में एसिड होता है जो बीमारियों के बैक्टिरियाज को मार देता है। इस कारण घर में गोबर से लिपने और गो-मूत्र छिड़कने की परंपरा थी। प्राचीन गोमूत्र चिकित्सक शास्त्रों में गोमूत्र से चिकित्सा करने वाले ऋषियों आदि का उल्लेख है। उनमें महर्षि पालकाव्य, ऋतुपर्ण, नल और नकुल प्रमुख हैं। इन ऋषियों ने विभिन्न ग्रंथों में गो-मूत्र पर बहुत लिखा है
किस प्रकार बनता है गोमूत्र अर्क आइये जाने-
भट्ठी पर एक बड़ा मटका गोमूत्र से भरकर रख दिया जाता है। भट्ठी के ताप से गर्म होते गोमूत्र को वाष्प के जरिये बाहर निकालने के लिए मटके में एक ओर छोटा सा सुराग निकालकर पाइप के माध्यम से एक बर्तन में छोड़ दिया जाता है। एक-एक बूंद बर्तन में जमा होती रहती है जिसे गौमूत्र अर्क कहा जाता है। सात लीटर गाय के मूत्र में करीब एक लीटर के आसपास अर्क निकलता है।
गोमूत्र से बने अन्य उत्पाद:-
आयुर्वेद के अलावा गोमूत्र नील, हैंड वाश, शैंपू, नेत्र ज्योति, घनवटी, सफेद फिनाइल, कर्णसुधा सहित कई उत्पाद बनाने में प्रयोग किया जाता है।
गाय और गोमूत्र
यदि गाय का मूत्र ही केवल इतना गुणकारी है तो उसके अन्य तत्वों का भी कितना महत्व होगा, यह आसानी से समझा जा सकता है। यही कारण है कि अर्थवेद में कहा गया है-एतद् वै विश्वरूपं सर्वरूपं गोरूपम्।
अर्थात गाय संपूर्ण विश्व-ब्रह्माण्ड का रूप है। इसी कड़ी में एक बंगाली कहावत का भी उल्लेख किया जाना उचित है-जो खाय गोरूर चोना, तार देह होय सोना। अर्थात जो प्रतिदिन गोमूत्र का सेवन करते हैं उनका शरीर सोने जैसा शुद्ध हो जाता है।


  • ·         गोमूत्र कड़वा, तीखा गर्म होता है।
  • ·         गोमूत्र का उपयोग सामान्य और गंभीर बीमारियों के इलाज में किया जाता है।
  • ·         इसीलिए गोमूत्र का पान पवित्र माना गया है।
  • ·         उसमें कीटनाशक के गुण भी होते हैं। इसलिए पूजा-पाठ के पहले उसका छिड़काव करते हैं।
  • ·         गोमूत्र के गुणों के कारण उसे इस युग का अमृत कहा गया है।
  • ·         वैज्ञानिक शोध से गोमूत्र में क्षार तत्वों की अधिकता पाई गई है

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